Shravani Mela in Hindi-बैद्यनाथ धाम की कहानी


नमस्कार आपका अनेकरूप  में स्वागत है।
सावन का महीना हो और बैद्यनाथ धाम की बात ना हो तो यह महीना सुना -सुना सा लगता है। यूपी ,बिहार ,झारखण्ड समेत पूरा देश यह महीना एक त्योहार के रूप में मनाता है। उसकी वजह है ,भोलेनाथ की महिमा।

यदि आप एक बार भी बैद्यनाथ धाम (झारखण्ड )के श्रावणी मेले में नहीं गए है तो यह जानकारी आपको जरूर जानना चाहिए।
BAIDYANATH DHAM
SHRAVANI MELA
.


इस श्रावणी मेले में लाखों के तादाद में लोग आते हैं भोलेनाथ को जल चढाने।
यह मेला साल में सिर्फ 1 बार सावन के महीने में लगता है और पूरा सावन महीना यह त्योहार चलता है।

यह मेला इतना भव्य होता है कि बैद्यनाथ धाम ,(देवघर) के रहने वाले कहते है कि  हम सिर्फ 1 महीना काम करते है और वो भी सावन में और 12 महीने की कमाई हो जाती है।
यानि इस मेले में इतनी भीड़ होती है कि दुकानदार 1 साल की कमाई 1 महीने में ही कर लेते है।


श्रावणी मेले का त्योहार और उमंग उत्साह 

यहाँ पर भक्तजन बोहोत ही प्रेम से सुल्तानगंज से जल उठाते हैं और बैद्यनाथ धाम तक बोल बम का नारा लगाते -लगाते पैदल ही जाते हैं। जिसकी दुरी लगभग 106 km है। यह यात्रा लगभग 3 दिन की होती है।

जल उठाने के लिए कांवर का प्रयोग किया जाता है ,जिसे लोग प्यार से कांवरिया भी कहते हैं।
यहाँ पर यात्री को कोई नाम से नहीं बल्कि 'बम ' कहकर पुकारते हैं। और यात्री चलते समय भी बम शब्द का नारा लगाती है।
जैसे - बोल बम का नारा है ,बाबा एक सहारा है।
भोला नगरीय दूर है ,जाना जरूर है।
छोटू बम बोल बम ,पतलू बम बोल बम ,मोटू बम बोल बम। इत्यादि।

कांवरिया यानि यात्रियों की संख्या इतनी होती है और अंदर जो उमंग होता है जल चढाने की ,तो उस समय इतना लम्बा रास्ता भी छोटा हो जाता है।
वहां के भव्य नज़ारे और ऊँची -ऊँची पर्वत और जगह -जगह पर यात्री के लिए व्यवस्था इस यात्रा को और भी रोमांचित और ऐतिहासिक बनाती है।


बैद्यनाथ धाम की कहानी 

ऐसा कहा जाता है कि रावण ने हिमालय पर स्थित होकर घोर तपस्या की। वह चाहता था भगवान शंकर कैलाश पर्वत छोड़कर उसके साथ लंका चले। उसके लिए वह अपना एक -एक सर काटकर शिवलिंग पर चढ़ाता रहा ,इस तरह वह अपने 9 सिरों को शिवलिंग में अर्पण कर देता है।

और जब वह अपने 10 वें सिर को काटने के लिए जाता है तभी शंकर जी प्रकट हो जाते हैं और रावण के कटे हुए सिरों को जीवित कर देते हैं।

और रावण से कहते हैं मानगो तुम क्या चाहते हो - तो वह कहता है मैं आपको कैलाश पर्वत से लंका ले जाना चाहता हूँ।
लेकिन भगवान शंकर कहते हैं कि मैं तो नहीं जा सकता लेकिन तुम मेरे शिवलिंग को ले जा सकते हो ,यह भी मेरा ही अंश है।

तो रावण शिवलिंग को ले जाने के लिए तैयार हो जाता है , लेकिन भगवन रावण को शर्त देते है -कि शिवलिंग को ले जाते समय तम्हे इसे धरती पर नहीं रखना है ,इसे तुम जहाँ रखोगे तो ये शिवलिंग वहीँ पर स्थापन हो जाएगी।

अब रावण शिवलिंग को लेकर लंका की और बढ़ता है , लेकिन रास्ते में 'चिताभूमि ' में ही उसे लघुशंका यानि पेशाब लग जाता है और वह अपनी लघुशंका को नियंत्रण नहीं कर पाता है।

तब वह एक बालक को वहां देखता है ,और उस बालक से रावण कहता है ,कि तुम इस शिवलिंग को पकड़ो में तुरंत आता हूँ। लेकिन रावण के पेट में इंद्रदेव के द्वारा अधिक जल  भर दिया जाता है जिससे रावण को लघुशंका करने में बोहोत ज्यादा समय लग जाता है।

और जब रावण लघुशंका करके वापस आता है तो देखता है शिवलिंग धरती पर रखा हुआ है ,और वह बालक चला गया है। तब रावण क्रोधित हो जाता है और उस शिवलिंग को उठाने की कोशिश करने लगता है और अंत में वह हार जाता है और  शिवलिंग को उठा नहीं पाता है। तब वह गुस्से में आकर शिवलिंग को अंगूठे से निचे दबा देता है।

जिससे शिवलिंग निचे चला जाता है ,और तब से वह शिवलिंग वहीँ पर स्थापन हो जाती है।
फिर ब्रह्मा ,विष्णु ,इंद्र आदि देवताये वहां पहुंचकर शिवलिंग की विधिपूर्वक पूजा करते है और स्थापित करते हैं।
और तब से लेकर आजतक लोग बैद्यनाथ धाम जाकर अनुकूल फल प्राप्त करते हैं।
धन्यवाद।

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