भगवान और देवी -देवता में अंतर - भगवतगीता


नमस्कार दोस्तों आपका AnekRoop में स्वागत है। आज हम आध्यात्म के ऊपर बात करेंगे और जानेंगे कि क्या देवी -देवता और भगवान दोनों अलग है और यदि अलग हैं तो कैसे ? भगवतगीता में इसके विषय में क्या कहा गया है। आज हम जो भी बात आपको बताने जा रहे है वो भगवतगीता के आधार पर बताएँगे और कोई अंधश्रद्धा की बात नहीं बताएँगे। जो भी बात हम करेंगे वह proof और प्रमाण के साथ करेंगे। इसलिए आप इसे जरूर अंत तक पढ़े।

bhagwan aur devi devta me antar
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भगवान और देवी -देवता में अंतर - भगवतगीता 9/25 श्लोक। 

यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः। 
भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजीनोपि माम।।

अर्थ :- देवताओं के भक्त देवताओं को पाते हैं , पितृभक्त पितरों ( माँ -बाप ) को पाते हैं , भूतों के पुजारी भूतों को पाते हैं और मेरे में तन -मन -धन यजन करने वाला मेरे को ही पाते हैं।

विस्तार में :- जो देवी -देवताओं की पूजा कर रहे हैं -वह देवी देवताओं को पाएंगे यानि वे देवी -देवताओं के प्रजा -साहूकार बनेंगे। या कहें उन्हें देवी -देवताओं से प्राप्ति होगी। वे देवी देवताओं से ज्ञान ,सुख -शांति का वर्षा पाएंगे।

और  जो अपने माँ-बाप को अधिक मानते है तो आज के समय में भी देखा जाता है कि उनको माँ -बाप बोहोत प्यार करते हैं और उन्हें अपनी कमाई हुई धन -दौलत सौंप देते हैं।

और भूतों के जो पूजने वाले हैं , प्रेत आत्माओं को , उनके नाम पर बलि आदि चढ़ाते हैं।  तो वे उन्ही प्रेत आत्माओं के वर्षे को पाएंगे , जैसे - भूत प्रेत की शक्ति , इनमे पांचो विकार - काम ,क्रोध ,लोभ ,मोह ,अहंकार अधिक रहेगा।  और ऐसे लोग दूसरों को अपने वस में करना चाहेंगे।

और जो मेरे में यानि भगवान में अपना तन -मन -धन  लगाता है तो वह उस ईश्वर के भाव को पाते हैं।
जैसे - भगवान में जो शक्तियाँ है , तो वह उन शक्तियों को पाता है।
ईश्वर का यदि हम संधि करे तो होता है - ईस =शासन करने वाला , वर = श्रेष्ठ
यानि जो श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ शासन करने वाला है। सभी को एक भाव आत्मभाव से देखने वाला।

तो जो ईश्वर में अपना तन -मन -धन लगाते है तो वे दुनिया का श्रेष्ठ ते श्रेष्ठ शासन कर्ता बनते हैं।
जैसे -लक्ष्मी और नारायण।



भगवान और देवी -देवता में अंतर है। 

इस श्लोक से यह proof हो जाता है कि भगवान अलग है और देवी -देवता अलग है।
जो देवी -देवता को पूजेंगे वह देवी -देवता से प्राप्ति करेंगे और जो भगवान को पूजेंगे वह भगवान से प्राप्ति करेंगे।

भगवतगीता में कई और श्लोक भी हैं वो इस बात को सिद्ध करती है।

7 /23  श्लोक :- अंतवत्तु फलं तेषां तद्भवत्यल्पमेधसाम। 
                      देवान्देवयजो यन्ति मद्भक्ता यन्ति मामपि।। 

अर्थ :- उन अल्पबुद्धि वाले , बेसमझ लोगों का तो वह फल विनाशी होता है ; देवों के प्रति त्याग करने वाले देवताओं को पाते हैं , मुझे भजने वाले मेरे (भगवान ) को ही पाते हैं।

निष्कर्ष - भगवान और देवी -देवता में अंतर।

तो इन श्लोकों से हमें यह पता चल गया है , कि भगवान अलग है और देवी -देवतायें अलग होते हैं।
गीता में और भी ऐसे श्लोक हैं जो इन बातों को सिद्ध करती है।

यदि आप गीता के श्लोकों से इस बात को नहीं मानना चाहते , तो आप अपने धर्म के ग्रंथों से समझ सकते है।
जितने भी धर्मपिता इस सृष्टि में आये , चाहे वह गुरुनानक हो , ईसामसीह हो , मोहम्मद हो , इब्राहिम हो इत्यादि।
तो उन्होंने कभी अपने को भगवान नहीं कहा।  उन्होंने अपनी उंगली ऊपर करते हुए कहा कि ,मैं भगवान नहीं हूँ , मैं भगवान का messenger  सन्देश देने वाला हूँ।

तो अब वह भगवान कौन है ? उसको हम कैसे भजेंगे जिससे कि उनसे प्राप्ति कर सके।  उसके लिए आप हमारे website www.anekroop.com में हमेशा आते रहे।

तो दोस्तों यह थी जानकारी भगवान और देवी -देवता में अंतर की। मुझे उम्मीद है की आपको यह जानकारी जरूर पसंद आई होगी। यदि आपका कोई सवाल या कोई सुझाव है तो हमें comment करके जरूर बताये।
और इस post को अपने दोस्तों , रिस्तेदारों तक जरूर पहुंचाए , जिससे उन्हें भी सच्चाई का पता चले।

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धन्यवाद। 

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