Geeta Ka Bhagwan Kaun Hai

नमस्कार दोस्तों आपका AnekRoop में स्वागत है। आज हम जानेंगे गीता के भगवान के बारे में।

 गीता क्या है ? संक्षिप्त परिचय
श्री कृष्ण गीता के भगवान है या नहीं ?
गीता का भगवान  साकार है या निराकार ?
गीता के श्लोक क्या कहते हैं गीता के भगवान के बारे में ?

ब्रह्माकुमार और ब्रह्माकुमारी के अनुसार :-
गीता क्या है ?
कौन है गीता का भगवान ?
गीता का भगवान कब और कैसे साबित होगा ?

और भी अनेक जानकारी गीता के भगवान के बारे में।
geeta ka bhagwan kaun hai
geeta ka bhagwan
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गीता क्या है ? संक्षिप्त परिचय

दुनियावी लोगों के अनुसार गीता यानि भगवतगीता एक धर्मशास्त्र है ,जो वेद व्यास के द्वारा लिखी गई है। 
जिसमे वर्तमान समय में 18 अध्याय जिसमे 700 श्लोक हैं। 

गीत शब्द से बनता है गीता , इसीलिए गीता के श्लोक गीत की तरह सुनने में लगते हैं। 
लोग सिर्फ इसी गीता के बारे में जानते हैं और इसी के श्लोकों के अर्थ को अपने -अपने तरीकों से समझते हैं। 

आज सबसे पहले मैं इसी गीता के भगवान के बारे में बताने वाला हूँ , जिससे आजतक आप अनजान थे। 

महर्षि वेद व्यास जी द्वापरयुग में जन्म लिए , ये सभी जानते हैं और उन्होंने 4 वेद और 24 पुराण सहित अन्य कई शास्त्र लिखे हैं उनमें से ही भगवतगीता एक धर्मशास्त्र है। 
जैसे - मुसलमानों का कुरान , और क्रिस्चियन का बाईबल है वैसे ही सनातन धर्म वालों का भगवतगीता , उनका धर्म शास्त्र है। जिसको स्वयं भगवान ने आकर सुनाया, ऐसी मान्यता है। 

और धर्मों में धर्मपिताओं के ज्ञान के अनुसार उनके धर्म पुस्तक बनाए गए है लेकिन सनातन धर्म में स्वयं भगवान के ज्ञान के अनुसार धर्म पुस्तक बनाई गई है ऐसी मान्यता है। 

लेकिन समय के बीतने पर सनातन धर्म के धर्मपुस्तक गीता पर अनेक बदलाव किये गए जिसमे उसके भगवान की पहचान को छुपाया गया है जिससे की लोगों की दुर्गति शुरू हो गयी। यदि गीता में भगवान का असल परिचय दिया होता तो कोई भी दूसरे धर्म वाले भारत के मंदिरों को नहीं लुटते और भारत को अपना तीर्थस्थान समझकर नमन करते। 

तो भाइयों आज इसी सच्चाई को बताने के लिए हम यह पोस्ट लिख रहे हैं , तो इसे बोहोत ही ध्यान से पढियेगा और फिर स्वयं निर्णय लीजियेगा कि क्या सच है और क्या झूठ है। 

श्री कृष्ण गीता के भगवान है या नहीं ?

वर्तमान समय में लोग यही मान के चल रहे हैं कि द्वापरयुग में श्री कृष्ण का जन्म हुवा और उन्होंने महाभारत युद्ध के दौरान समय को रोककर भगवतगीता का ज्ञान अर्जुन को दिया। 
जिसमे श्रीकृष्ण को अर्जुन के रथ पर दिखाया जाता है। 

लेकिन गीता के श्लोक तो कुछ और ही कहते हैं। 
सबसे पहले तो आप ये समझिये कि गीता के श्लोक गीत (कविता ) की तरह है जिसमे अलंकारित भाषा का प्रयोग किया गया है। 

जैसे - आजकल के गीत होते हैं - मैं चाँद को ले आऊंगा तेरे लिए। 
तो क्या वह सच में चाँद को लाने की बात कर रहा है या फिर इसका अर्थ है कि वह उसके लिए कुछ भी कर गुजर जायेगा। तो ऐसे ही होते हैं अलंकारित भाषा। 
जिसका सही विश्लेषण केवल कवि ही दे सकता है। 

लेकिन कवि व्यास जी तो संस्कृत में सभी श्लोक लिख करके चले गए , लेकिन उनके जाने के बाद अलग -अलग ऋषि-मुनि अपने -अपने तरीकों से उसे समझाना चालू कर दिए। 

माध्वाचार्य की गीता कहती है - आत्मा अलग है और भगवान अलग है। आत्माएं अनेक हैं और परमात्मा एक है। 
वहीँ  शंकराचार्य की गीता कहती है - हरेक आत्मा में परमात्मा है , मैं भी ब्रह्म तुम भी ब्रह्म। आत्मा सो परमात्मा कह देती है। 

अब इसमें सच्चाई क्या है ये तो केवल कवि ही दे सकता है या फिर स्वयं भगवान ही दे सकते हैं। 
लेकिन द्वापरयुग के अंत तक तो गीता पूरी तरह बदल जाती है सैकड़ों (100 ) ऋषि और पंडित अपना-अपना गीता लेकर बैठ जाते हैं और फिर गीता के भगवान की अस्तित्व पूरी तरह से मिट जाती है। 

और इसीलिए कलियुग आने पर सबसे अधिक दुर्गति भारतवासियों की होती है क्योंकि वह अपने भगवान को ही भूल जाते है और अन्य देवी-देवताओं को अपना भगवान मानकर उनके मत पर चलने लगते हैं। 

भगवतगीता के श्लोकों में कहीं भी श्रीकृष्ण का नाम नहीं आया है , वहाँ पर है भगवानुवाच। 
श्री क्रिश्नोवाच नहीं है। यानि गीता का ज्ञान देने वाला स्वयं भगवान है। 

लोग श्रीकृष्ण को भगवान मानते हैं लेकिन श्री कृष्ण (देवता ) हैं अन्य 33 करोड़ देवताओं की तरह वहीँ भगवान देवी -देवताओं से अलग है। जो की स्वयं गीता के श्लोक साबित करते हैं। 

गीता के श्लोक क्या कहते हैं - गीता के भगवान के बारे में। 

10 /2  न में विदुः सुरगणाः प्रभवं न महर्षयः।
         अहमादिर्हि देवानां महर्षीणां च सर्वशः।।

अर्थ - मेरे उत्कृष्ठ जन्म को न देवगण न महान ऋषिजन ही जानते हैं , क्योंकि देवताओं और महर्षियों का सब प्रकार से आदि मैं ही हूँ।

{ इस श्लोक से यह साबित हो जाता है कि द्वापरयुग में जिन ऋषियों ने भगवतगीता के अलग-अलग अर्थ निकाले हैं उनमे से कोई भी भगवान के सही परिचय को नहीं जानते हैं। इसका मतलब यह है कि जो वे गीता में श्री कृष्ण को भगवान कहते हैं वो भी गलत हो जाता है।  }

9 /25  यान्ति देवव्रता देवान्पितृन्यान्ति पितृव्रताः।
        भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजीनोपि माम्।। .

अर्थ :- देवताओं के भक्त देवताओं को पाते हैं ,पितृभक्त पितरों (माँ -बाप ) को पाते हैं, भूतों के पुजारी भूतों को पाते हैं और मेरे में यजन करने वाला मेरे को ही पाते हैं।

{ इस श्लोक से यह साबित हो जाता है कि देवी-देवता अलग है और भगवान अलग है। }




तो फिर प्रश्न यह उठता है कि भगवान कौन है ? उनका असली परिचय क्या है ?
उसके लिए आगे के post को पढ़ते रहे :-

9 /4  मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना।
       मतस्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः।।

अर्थ - मेरे अव्यक्त (निराकारी) स्वरुप द्वारा यह सारा जगत विस्तृत हुवा है।
अतः सभी प्राणी मुझमे स्थित हैं परन्तु मैं उनमें स्थित नहीं हूँ।

{ इस श्लोक से यह साबित हो जाता है कि भगवान का रूप अव्यक्त है ( जिसे देखा ना जा सके -निराकार ) और वह सभी जगह नहीं है , सभी के अंदर नहीं है। जिस तरह नीम के बीज की कड़वाहट पुरे वृक्ष में होती है परन्तु पुरे वृक्ष में बीज नहीं होते , उसी तरह सभी प्राणियों के अंदर भगवान नहीं होते लेकिन भगवान की याद होती है। }




10 /3  यो मामजमनादिम च वेत्ति लोकमहेस्वरम।
        असम्मूढः स मर्त्येषु सर्वपापैः प्रमुच्यते।। .

अर्थ - जो ज्ञानी मुझको अजन्मा ,अनादि और तीनों लोकों का महान ईश्वर जानता है , वह महुष्यों में मोहरहित हुआ सब पापों से मुक्त हो जाता है।

{ इस श्लोक से हमें यह पता चल जाता है कि भगवान अजन्मा और अनादि हैं ,यानि वो कभी भी गर्भ से जन्म नहीं लेते हैं। }

लेकिन प्रश्न यह उठता है कि जब वे गर्भ से जन्म नहीं लेते हैं तो फिर कैसे जन्म लेते हैं?

4 /6  अजोपि सन्नव्ययात्मा भूतानीमीश्वरोपि सन।
        प्रकृतिं स्वामधिष्ठाय सम्भवाम्यात्ममायया।।

अर्थ - अक्षय अर्थात जिस आत्मा की शक्ति का कभी व्यय न हो , वह मैं अजन्मा होते हुवे भी प्राणियों का शासनकर्ता होते हुवे भी , अपने स्वभाव का आधार लेकर आत्मशक्ति से प्रगट /प्रत्यक्ष होता हूँ।

4 /9   जन्म कर्म च मे दिव्यमेवं यो वेत्ति तत्त्वतः।
        त्यक्त्वा देहं पुनर्जन्म नैति मामेति सोर्जुन।।.

अर्थ - हे सद्भाग्य का अर्जन करने वाले अर्जुन ! इस प्रकार मेरे दिव्य जन्म और कार्यों को जो सत्य रूप में जान लेता है , वह शरीर को त्यागकर फिर से ( दुःख की दुनिया में ) जन्म नहीं लेता , मुझको प्राप्त होता है।

{ इन श्लोकों से यह पता चल जाता है कि भगवान दिव्य जन्म लेते हैं। इसके लिए गीता में एक शब्द आया है प्रवेष्टुं यानि वे प्रवेश करते हैं और प्रवेश करके अपना कार्य करते हैं।  }

उदाहरण - जैसे महाभारत की लड़ाई के समय भगवान को अर्जुन के रथ में दिखाते हैं -

 यहां कोई घोडा गाडी रथ की बात नहीं हो रही है बल्कि यहां अर्जुन का शरीर ही रथ है और शरीर की इन्द्रियां घोड़े है और उसी शरीर ( रथ ) में भगवान दिव्य प्रवेश करते हैं और अपना कार्य करते हैं।
और इस प्रकार भगवान  का दिव्य जन्म होता है।

जैसे - आज कल के भूत-प्रेत प्रवेश करते हैं और कहते हैं मैं काली हूँ मैं दुर्गा हूँ , वैसे ही भगवान भी प्रवेश करते हैं लेकिन भूत-प्रेत की प्रवेशता में और भगवान की प्रवेशता में बोहोत फर्क होता है।

ये भी जाने :-



लेकिन अब प्रश्न यह है कि वे कब अपना दिव्य जन्म लेते हैं और क्यों ?


4 /7  यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
        अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम।।

4 /8 परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम।
      धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे।।.

अर्थ :- हे भारतवंशी ! जब-जब धर्म की ग्लानि और अधर्म की वृद्धि होती है ,तब मैं स्वयं जन्म लेता हूँ।
साधु संतों की  रक्षा के लिए ,दुराचारियों के विनाश के लिए और धर्म की सम्पूर्ण स्थापना के लिए मैं जन्म लेता हूँ।

{ यहां पर साफ़-साफ़ बताया गया है कि जब धर्म की ग्लानि होती है , और अधर्म की वृद्धि होती है तब मैं आता हूँ, तो अब आप ही बताइये कि क्या सतयुग और त्रेत्रायुग में अनेक धर्म होते हैं ?
 नहीं होते सिर्फ सनातन धर्म ही होता हैं।  अनेक धर्म अभी कलियुग के अंत समय में होते हैं और अभी ही अधर्म की वृद्धि होती है।

आज देखने में भी आता है कि धर्म के नाम पर लोग आपस में लड़ते हैं , मारा-मारी , खून -खराबा अभी सबसे ज्यादा  होती है। पैसे के आगे सभी अपना सर झुका लेते हैं और अपने धर्म को भूल जाते हैं।
अभी ही वह स्थिति है जब साधु (ईंमानदार -सच्चे ) लोगों को दबाया/मार दिया जाता है , जिससे की भ्रस्टाचार की दिन-प्रतिदिन बढ़ोतरी होते जाती है।

क्या आपको नहीं लगता है कि अभी भगवान को आने की सबसे ज्यादा जरूरत है जब प्रकृति और मनुष्य की मानसिकता सबसे निचले स्तर पर है।

13 /16  अविभक्तं च भूतेषु विभक्तमिव च स्थितं।
           भूतभर्तृ च तज्ज्ञेयं ग्रसिष्णु प्रभविष्णु च।।

अर्थ :- वह परमपिता अखंड अर्थात अविभाज्य है (एक हैं ), फिर भी प्राणियों में विभक्त हुवा सा रहता है (याद के द्वारा ) और इस प्रकार प्राणियों का भरण-पोषण करने वाला विष्णु ,विनाशकर्ता शंकर और उत्पत्तिकर्ता ब्रह्मा माना जाता है।

{ इस श्लोक से यह पता चल जाता है कि निराकार भगवान जब इस धरती पर आते हैं तो अपने 3 मूर्तियों (ब्रह्मा ,विष्णु ,शंकर ) के द्वारा  स्थापना ,विनाश और पालना का कार्य करते हैं। }

और यदि आप भगवतगीता को मानते हैं और उसमे लिखे श्लोकों का अध्यन करते हैं तो अभी तक के post से आप समझ गए होंगे कि भगवान का असल स्वरुप क्या है और वह कैसे जन्म लेते हैं और जन्म ले करके क्या करते हैं।

आप इस बात को भी जरूर मानेंगे कि सृष्टि को परिवर्तन करने का कार्य और एक सत्य आदि सनातन देवी-देवता धर्म की स्थापना का कार्य अभी स्वयं निराकार भगवान के द्वारा चल रहा है और वही निराकार भगवान , गीता के भगवान भी हैं।

इसकी अधिक जानकारी के लिए आगे के पोस्ट को पढ़ते रहें।




ब्रह्माकुमार /कुमारी के अनुसार गीता क्या है ?

वह निराकार शिव भगवान, ब्रह्मा के द्वारा स्थापना का कार्य करते हैं , और जिसके लिए वे उनमे प्रवेश होके गीता का ज्ञान देते हैं और इसी ज्ञान को गीता का ज्ञान कहा जाता है। जिसे मुरली भी कहते हैं।

यह ज्ञान स्वयं सिद्ध करता है कि सिवाय भगवान के ऐसा अद्भुत ज्ञान कोई दे नहीं सकता जिसमे सृष्टि के आदि मध्य और अंत का ज्ञान है।

तो असल में यही गीता है , वो वेद व्यास की गीता पढ़ते-पढ़ते मनुष्यों की और ही दुर्गति होते आई है , उनके अर्थ को किसी ने सही से समझाया नहीं है अभी स्वयं भगवान उनके अर्थों को समझा रहे हैं। और अपना परिचय दे रहे हैं क्योंकि बिना भगवान के कोई भी भगवान का परिचय नहीं दे सकता , वह स्वयं ही आकर अपना परिचय देते हैं लेकिन किसके द्वारा देते हैं यह अभी जानना है।

कौन है गीता का भगवान ? गीता का भगवान कैसे सिद्ध होगा ?

अब ब्रह्मा का तन तो 1969 में चला गया , तो क्या 1969 में भगवान सारे संसार में प्रत्यक्ष हो गए ?
नहीं हुवे।
इससे यह साबित होता है कि ब्रह्मा के तन द्वारा भगवान शिव गीता के भगवान नहीं कहे जायेंगे। ऐसा इसलिए क्योंकि ब्रह्मा के द्वारा केवल ज्ञान सुनने और सुनाने का कार्य हुवा उस ज्ञान के रहस्यों को समझाया नहीं गया जिसको जानकर आत्मा परम गति , चढ़ती कला को जाती है।

तो फिर आता है शंकर का पार्ट , जिसके लिए मुरली में कहा गया है :-

1. भल यह ब्रह्मा चला जाये , फिर बाबा जिसमे भी प्रवेश करेंगे उसे ब्रह्मा कहना पड़े।

2. पहले होती है स्थापना , फिर होता है विनाश ,फिर होती है पालना।

और इसके अनुसार  ब्रह्मा द्वारा स्थापना के कार्य के बाद अभी शंकर द्वारा भगवान शिव का कार्य चल रहा है। और इसी शरीर (रथ ) के द्वारा भगवान शिव अपने स्वभाव का आधार लेकर आत्मशक्ति से पूरी दुनिया में प्रत्यक्ष होंगे और फिर गीता का भगवान शिव शंकर भोलेनाथ स्वतः ही साबित हो जायेंगे। जिस गीता के ज्ञान से सारे प्राणियों का कल्याण होगा।

इसकी अधिक जानकारी के लिए विजिट करे :- www.pbks.info

Note :- 

आज के इस post से हमने यह जान लिया कि-

गीता क्या है , भगवान अलग है और देवी-देवता अलग है ,भगवान निराकार हैं और गर्भ से जन्म नहीं लेते हैं। वे भी प्रवेश करते हैं जैसे भूत-प्रेत प्रवेश करते हैं।  उनके जन्म को दिव्य जन्म कहा जाता है।
वे तब आते हैं जब दुनिया में अनेक धर्म हो जाते हैं और धर्म के नाम पर लोग आपस में लड़ते /झगड़ते रहते हैं ,और सच्चे लोगों को दबाया/मार दिया जाता है, भ्रस्टाचार की अति हो जाती है।

आकरके सबसे पहले ब्रह्मा द्वारा ब्राह्मण धर्म की स्थापना का कार्य करते हैं फिर शंकर द्वारा ब्राह्मणो के 5 विकारों और अधर्मियों का विनाश करते हैं फिर बाद में विष्णु द्वारा संगमयुगी सतयुग में पालना करते हैं।

और इस प्रकार यह साबित हो जाता है कि गीता का भगवान वास्तव में भगवान शिव शंकर भोलेनाथ है कोई कृष्ण ( ब्रह्मा) या कोई देवता नहीं है।

यदि यह बात दूसरे धर्म के लोग जानते कि गीता का भगवान भी वही भगवान/अल्लाह /खुदा /GOD  है जिसको हम मानते हैं तो फिर कभी कोई दूसरे धर्म के लोग भारत पर आक्रमण नहीं करते और ना ही मंदिरों को लूट करके ले जाते और ना कभी कोई धर्म परिवर्तन होता। 

तो भाइयों ये थी जानकारी गीता के भगवान के बारे में। मुझे उम्मीद है कि आपको यह जानकारी जरूर पसंद आई होगी। यदि इससे सम्बंधित आपका कोई सवाल या कोई सुझाव है तो हमें comment करके जरूर बताये।

और इस post को अपने दोस्तों तक , facebbok ,watsapp में share करें ताकि और लोगों तक सच्चाई पहुंच सके ।
अपना महत्वपूर्ण समय देकर इस post को पढ़ने के लिए आपका बोहोत -बोहोत धन्यवाद। 

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